Friday 25 November 2016

प्राथमिक शिक्षा और सरकारी कार्य योजना

भारत जनसंख्या के दृष्टिकोण से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। वहीं पर शिक्षा के मामले में भी सबसे बड़ी अशिक्षित जनसख्या भी यहीं निवास करती है । स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश ने जहाँ आर्थिक विकास किया वही शिक्षा के मामले में भी बहुत प्रगति की ।
जिन गाँवों में एक भी विद्यालय नहीं था और इने-गिने ही शिक्षित व्यक्ति थे
, वहाँ पर विद्यालय की स्थापना की गयी और लोगों में शिक्षा के प्रति जागृति आई । लेकिन जितनी तेजी से विकास होना चाहिए था या जितनी गति से साक्षरता दर बढ़नी चाहिए थी, नहीं बड़ी । इसके कई कारण थे। इसमें बेरोजगारी और निर्धनता प्रमुख थी ।
इसको देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर सबको शिक्षित और साक्षर बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए । अनेक गैर सरकारी या अर्धसरकारी योजनाएँ भी काम कर रही थीं । इससे जहाँ लोग बहुत बड़ी संख्या मे अशिक्षित और निरक्षर थे
, वहाँ पर उन्हें यह समझ में आने लगा कि बिना पढ़े-पढाए न उनका कल्याण सम्भव है और न ही परिवार तथा समाज की उन्नति हो सकती है। यह भी समझ में आने लगा कि शिक्षा वह अंधकार मिटने का सशक्त माध्यम है जिससे व्यक्ति, परिवार और समाज का वहुमुखी विकास होता है।
भारत के संविधान मे चौदह साल तक की उम्र के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य और बिना शुल्क की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। इस दिशा में सन्
2002 में 86वा संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया । इससे देश के हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो गया ।
इससे शिक्षा के प्रति जहाँ लोगों में नई चेतना जगी वहीं पर राज्यों को फर बच्चे को शिक्षा देना अनिवार्य हो गया । इस दिशा में केरल, तमिलनाडु और दिल्ली ने काफी प्रगति की । आज प्राथमिक शिक्षा के लिए देश में नई जागृति दिखाई दे रही है। इसी के तहत 1988 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत हुई । इस मिशन ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा क्रान्तिकारी परिवर्तन किया ।
असमानताएँ कई स्तरों पर दूर हुई । शिक्षा का हर स्तर पर विस्तार हुआ ।
1990 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने पूरे देश को एक सूत्र में बांधा । इसका परिणाम था कि 1999 में जो साक्षरता दर 52.29 प्रतिशत थी वह बढ्‌कर 2001 में पहली बार 64.84 प्रतिशत तक पहुँच गई ।
भारत सरकार ने
1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पीएनई का प्रारम्भ किया । इस नीति को लागू करने के छ: वर्षो के बाद 1992 मे इसकी समीक्षा की गई । इसमें यह सुझाव आया कि जब तक बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र मे ठोस कार्य-योजना नहीं बनाई जाएगी तब तक देश के हर बच्चे को साक्षर या अक्षर ज्ञान नही कराया जा सकता है ।
1990 में विश्व घोषणा (ई.एफ.ए) प्राथमिक शिक्षा के सका में लागू की गई । इसमें लैंगिक समानता, प्रौढ़ शिक्षा के साथ-साथ बालकों की देख-रेख पर विशेष ध्यान दिया गया । यह उन उपेक्षित बच्चों के लिए वरदान साबित हुआ जो धनाभाव उपेक्षा और अन्य कारणों से हर स्तर पर पिछड़ जाते थे ।
गाँव के बच्चों के लिए यह आनदोत्सव मनाने जैसा था । खासकर पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से सबधित बच्चो के लिए बहुत की कारगर सिद्ध हुआ । केन्द्र और राज्य सरकारों ने गाँव के बच्चों के लिए विशेष धन आवंटित किया । प्राथमिक शिक्षा को आंदोलन का रूप सबसे पहले दसवीं पंचवर्षीय योजना में दिया गया। इसके लिए केन्द्र ने 28750 करोड़ रुपए का आवंटन किया । इसी तरह वार्षिक योजना 2002-03 के लिए केन्द्र ने 4667 करोड़ रुपए दिए ।
इससे सबसे अधिक गाँव के बेसहारा और अशिक्षित बच्चों को लाभ पहुँचा । क्योंकि धनाभाव के कारण गाँव के बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित थे । फिर 2003-04 में केन्द्र ने आवंटित धनराशि को बढ़ाकर 5217 करोड़ रुपए कर दिया ।
इससे देश के हर गाँव में स्थित प्राथमिक विद्यालयों की हालत में सुधार आया । जब केन्द्र में यूपीए की सरकार आई तो
6-14 आयु वर्ग के बच्चों के लिए अभूतपूर्व कदम उठाए। इससे बुनियादी शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने में बहुत सहायता मिली ।
सरकार ने ग्रामीण बच्चों में प्राथमिक शिक्षा के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए पोषाहार के नए कार्यक्रम को और अधिक बढ़ावा दिया । इसके लिए सरकार ने सभी केन्द्रीय करों पर
2 प्रतिशत का उपकर लगाया । इसे और भी कारगर बनाने के लिए एनसीएमपी से संबंधित कार्यक्रमों के लिए कई प्रावधानों में फेरबदल किया।
एसएसए के लिए सरकार ने
200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया । मध्याह्‌न भोजन कार्यक्रम के लिए 1675 करोड़ रुपए के प्रावधान में 1232 करोड़ रुपए और जोड़े गए । इस तरह अनेक कर्यक्रमों को एक साथ मिलाकर चलाने से प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई । सन् 2004 -05 की वार्षिक योजना में 5750 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया ।
लेकिन यह राशि साक्षरता दर को बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं थी । इसलिए केन्द्र सरकार ने इसमें
12 करोड़ रुपए से अधिक राशि और आवंटित की । इसी तरह सन् 2005 -06 की वार्षिक योजना में सरकार ने दस करोड़ रुपए और जोडे इस तरह प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में केन्द्र और राज्य सरकारों की आपसी भागीदारी से देश में एक नई क्रान्ति का सूत्रपात हुआ ।
केन्द्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम चलाकर गाँवों में उन बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दिया जो स्कूल जाने में असमर्थ थे । इनमें वे भी शिक्षित हुए जो पढ़ने-लिखने की उम्र में पड़ नहीं पाए थे । इससे गाँवों में एक नई रोशनी आई । बच्चे
, बूढ़े और महिलाओं को अक्षर-ज्ञान का एक बेहतरीन अवसर प्राप्त हुआ ।
एक आंकड़े के अनुसार देश में सभी को शिक्षित करने के लिए आठ लाख विद्यालयों की आवश्यकता है और इन आठ लाख विद्यालयों में कम से कम सोलह लाख अध्यापको की आवश्यकता है । इन विद्यालयों में छ: लाख विद्यालय गाँवों में होने चाहिए ।
जाहिर है केन्द्र और राज्यों की भागीदारी से यह असम्भव सा दिखने वाला कार्य अब सम्भव दिखाई पड़ने लगा है । केन्द्र सरकार अनेक शिक्षा योजनाओ के माध्यम से गाँव के सभी बच्चों को शिक्षित बनाने का कार्य शुरू कर चुकी है । इसमें जो राज्य पूरे मनोयोग से हाथ बटा रहे हैं, वहाँ के सारे बच्चे शिक्षित हो चुके है ।
और जिन राज्यों ने केन्द्र के द्वारा आवंटित धन का ठीक उपयोग नहीं किया
, वहाँ आज भी गाँवों में अशिक्षा का साम्राज्य फैला हुआ है । सबसे ताज्जुब की बात यह है कि देश के ऐसे अनेक राज्य हैं, जो आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाते है, लेकिन शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में आज भी बहुत पीछे है, ऐसे राज्यों में हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु प्रमुख हैं ।
लेकिन आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध न होते हुए भी मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्य प्राथमिक शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में बहुत आगे निकल चुके है । मतलब इन रज्यों ने केन्द्र के साथ पूरी भागीदारी ही नहीं की
, बल्कि केन्द्र द्वारा आवंटित धन का पूरा इस्तेमाल तो किया ही, अपने स्तर पर भी अनेक योजनाओं के माध्यम से भी कार्य किया ।
गाँवों में शिक्षा अलख जगाने के लिए जैसी योजना और कार्य पद्धति मध्य प्रदेश और केरल ने अपनाई वह देश के दूसरे राज्यों के लिए एक मिसाल ही है । मध्य प्रदेश में रात्रि कालीन कक्षाएँ चलाकर उन ग्रामीण बच्चों को भी शिक्षा दी गई और दी जा रही है जो अत्यंत निर्धन परिवार के होने के कारण दिन भर श्रम करते हैं या खेती के कार्य में लगे रहते हैं ।
लेकिन रात्रि में पढ़ने के लिए राज्य प्राथमिक शिक्षा योजना के तहत चलने वाली कक्षाओं में पढ़ते हैं। मतलब जहाँ चाह वहाँ राह की कहावत यहाँ पूरी तरह चरितार्थ होती दिखाई पड़ रही है । गांवों के पिछड़ेपन की एक महत्वपूर्ण वजह गाँवों में शिक्षा के विकास का न होना भी है । इसलिए चतुर और धूर्त इनका (ग्रामीणों) शोषण भी वर्षों से करते आ रहे हैं । इसे ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने सर्वसुलभ शिक्षा उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण योजनाएँ प्रारम्भ कीं ।
जितना धन केन्द्र सरकार गांवों को रोशन करने के लिए मुहैया करा रही है यदि इसका ठीक से उपयोग हो जाए तो गाँव की तस्वीर बदल सकती है । गाँवों में सरकारी विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को केवल शिक्षा ही मुफ्त में नहीं उपलब्ध कराई जा रही है
, बल्कि उनके लिए पढ़ने-लिखने की सारी सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है ।
देश के आदिवासी क्षेत्रों में केन्द्र और राज्य सरकारों की सहभागिता से बड़े स्तर पर प्राथमिक विद्यालयों को खोला जा रहा है । वे वनवासी बच्चे जो कभी विद्यालय शब्द का नाम तक नहीं सुने थे
, वे अब पढ़ाई करने के लिए खुशी-खुशी वहाँ जाते हैं ।
इसी तरह गाँव के अशिक्षित वनवासी भी आँगनवाडी केन्द्रों पर जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों सम्मिलित हैं अक्षर ज्ञान के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। इस तरह सरकार की सबको शिक्षित करने की नीति खूब फूल-फल रही है ।

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के शिक्षा विभाग द्वारा प्रकाशित पत्र एजूकेशन फॉर आल: द इण्डियन सीन’ (दिसम्बर 1993) के अनुसार जहाँ भारतवर्ष की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली ने विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था का दर्जा प्राप्त कर लिया है, वहाँ विद्यालय से बाहर पाये जाने वाले बच्चों, (पूरे विश्व का 22 प्रतिशत) तथा प्रौढ़ निरक्षरों (पूरे विश्व का 30 प्रतिशत) की एक बड़ी संख्या है इसे मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार ने जो योजनाएँ चलाईं उससे बच्चों और प्रौढ़ निरक्षरों की बढ़ती संख्या में निश्चित रूप से लगाम लगी है । सरकार ने बेसिक शिक्षा को प्राथमिकता के तौर पर लेकर जो योजनाएँ नव साक्षरों के लिए पिछले दस वर्षों मे बनाई हैं, वे सफलता के साथ आगे बढ रही हैं । इसके बावजूद इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है ।
सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के बावजूद गाँवों के विकास के लिए बड़े स्तर पर कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है । जितनी और जैसी शिक्षा एक बच्चे या प्रौढ़ को चाहिए
, उतनी और वैसी शिक्षा की व्यवस्था हुए बिना समग्र ग्रामीण विकास हर स्तर पर नहीं हो पाएगा ।
अशिक्षितों को इस तरह की शिक्षा दी जानी चाहिए कि उसे किसी भी स्तर पर दूसरों का सहारा नहीं लेना पड़े । देश के अधिकांश गाँवों में आज भी बेरोजगारी
, कुपोषण, शोषण, गरीबी, असमानता और दूसरी अनेक बुराइयों बड़े पैमाने पर व्याप्त हैं ।
इससे मुक्ति पाने के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए कि हर कोई हर स्तर पर जागरुक बन सके । जिस तरह से जनसंख्या वृद्धि हो रही है उसे देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारों को प्राथमिक शिक्षा प्रणाली और योजनाओ पर नए सिरे से विचार करना चाहिए ।
इससे आवंटित धन का पूरा उपयोग हो सकेगा और गाँवों से शहरों की मेर हो रहे पलायन पर भी रोक लग सकेगी । अर्थशास्त्रियों के गाँवों में विकास का स्तर तेजी से न बढने का कारण अशिक्षा के अलावा परम्परागत सोच भी है ।
यह सोच गाँवों के विकास को हर स्तर पर बाधित करती है । इस पर भी केन्द्र और राज्य सरकारों को सोचना चाहिए । महज बुनियादी शिक्षा और अक्षर ज्ञान हो जाने से गाँवों का हर स्तर पर विकास सम्भव नहीं है । शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च का सही उपयोग तो होना ही चाहिए
, साथ में जागरुकता लाने के काम को भी प्राथमिकता के तौर पर लिए जाने की आवश्यकता है।
गाँव में आज भी
95 प्रतिशत लोग कृषि पर आश्रित हैं। इसे ध्यान में लाकर ही सरकार को शिक्षा की योजनाएँ बनानी चाहिए । तभी सरकार द्वारा आवीट्‌त धन का उचित उपयोग हो सकता है । कृषि संस्कृति की अपनी अलग पहचान और मूल्य-है। हर स्तर पर यह शहरों से भिन्न है । यह सारी बातें शिक्षा से जुड़ी हुई हैं । बच्चे को किस तरह से प्राथमिक शिक्षा देनी चाहिए, इस पर ध्यान देकर ही देश के हर बच्चे को साक्षर और जागरुक बनाया जा सकता है ।
इसी तरह प्रौढ़ और महिलाओं के विषय में भी कार्य योजना बनाई जानी चाहिए । गाँव का विकास तभी होगा जब सभी आयु वर्ग के लोग पूरी तरह शिक्षित और जागरुक होंगे । यह बात केवल देश के अर्थशास्त्री ही नहीं कह रहे हैं
, बल्कि विदेश के कृषि विशेषज्ञ भी कह रहे हैं जो वर्षो से भारत के गाँवों पर शोध कर रहे हैं ।
Article shared by : S.Priyadarshini

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